देश-दुनिया में महिलाओं की स्थिति आज भी एक साथ कई दुराग्रहों की शिकार है। मानवाधिकार से लेकर लैंगिक दुराग्रह तक हम चाहे जो भी सिरा पकड़कर आकलन करें आधी दुनिया के हिस्से की लड़ाई अभी भी निणार्यक दौर से गुजरनी बाकी है। यही नहीं, एक बड़ी चुनौती यह भी है कि महिलाएं जो कर रही हैं, देश-दुनिया को जीने लायक बनाए रखने में उनका जो योगदान है, उस बारे में या तो बात की ही नहीं जाती या फिर आधी-अधूरी बातें होती हैं। ऐसा ही एक मुद्दा है पर्यावरण और महिलाओं का रचनात्मक साझा। इस साझे को निभाने में पुरुषवादी वर्चस्व और मानिसकता से महिलाओं को जिस तरह भिड़ना पड़ा है, उसके बारे में जानना-समझना हमारे दौर के एक जरूरी दरकार का हिस्सा है।
पर्यावरण सुरक्षा का जेंडर एंगल
साफ है कि पर्यावरण सुरक्षा पर विमर्श का एक जेंडर एंगल भी है।मसलन आज ऐसे क्षेत्रों में जहां अंधाधुंध पेड़ काटे जा रहे हैं, वहां महिलाओं को रसोई के लिए लकड़ी लाने के लिए घर के पुरुष महिलाओं को कई किलोमीटर दूर तक जाने को विवश करते हैं। इसी तरह जहां पानी की किल्लत है, वहां पानी जुटाने का दायित्व आमतौर पर महिलाओं पर ही है। कई इलाकों में एक-एक घड़ा पानी के लिए महिलाओं को 10-15 किलोमीटर तक पैदल चलना पड़ता है। अपने कई अध्ययनों से वरिष्ठ पर्यावरणविद अनुपम मिश्र ने यह बताया है कि ऐसे क्षेत्रों में पर्यावरण सुरक्षा को लेकर कोई भी पहल शुरू होती है तो उसमें पहली पंक्ति में महिलाएं नजर आती हैं। मिश्र ने ऐसे प्रयोगों के उदाहरण राजस्थान से लेकर, हिमाचल, उत्तराखंड और तमिलनाडु जैसे राज्यों में चले पर्यावरण संरक्षण आंदोलनों के लेकर गिनाए हैं।
दरअसल, प्राकृतिक संसाधनों यथा- वन, मिट्टी एवं जल से महिलाओं का सीधा एवं गहरा संबंध है। पारंपरिक तौर पर महिलाओं ही इनका संरक्षक रही भी हैं।आदिवासी संस्कृति में तो वन-संपदा की अर्थव्यवस्था पूर्णतया महिलाएं ही संभालती रही हैं। आज भी पर्यावरण-संरक्षण, खासतौर से वन-संरक्षण में महिलाओं की भागीदारी अहम है और महिलाएं इसके प्रति जागरुक भी हैं।
चिपको आंदोलन
देश के पर्वतीय अंचलों में चले ‘चिपको आंदोलन’ ने पर्यावरण संरक्षण, खासतौर से वन-संरक्षण की दिशा में एक नई चेतना पैदा की है। यह आंदोलन पूर्णतया महिलाओं से जुड़ा रहा और इस इसने यह सिद्ध कर दिया कि जो काम पुरुष नहीं कर सकते, उसे महिलाएं कर सकती हैं। यह आंदोलन उत्तराखंड के चमोली, कुमाऊं, गढ़वाल, पिथौरागढ़ आदि में प्रारंभ हुआ और जंगलों के विनाश के विरुद्ध सफल आंदोलन के रूप में पूरी दुनिया में सराहा जा चुका है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि इस आंदोलन का संचालन करने वाली महिलाएं पहाड़ी ग्रामीण क्षेत्रों की रहने वाली निरक्षर एवं अनपढ़ महिलाएं रहीं।
यह स्वतः स्फूर्त एवं अहिंसक आंदोलन विश्व के इतिहास को महिलाओं की अनूठी देन है। यह आंदोलन उनका अपनी जीवनरक्षा का आंदोलन है। इन महिलाओं ने अपने आंदोलन को इस तरह से संगठित किया है कि उनके गांवों का प्रत्येक परिवार जंगलों की रक्षा के लिए सुरक्षाकर्मी तैनात करके सामूहिक चंदा अभ यान से उनके वेतन भुगतान की व्यवस्था करता है। इन महिलाओं के शब्दकोश में असंभव नामक कोई शब्द है ही नहीं। चिपको आंदोलन की ताकत और उसकी सफलता के केंद्र में गौर देवी, अमृता देवी, सुदेशना देवी, सरला बहन, बचनी देवी और मीरा बहन सरीखी महिलाएं रहीं।
इस आंदोलन की यह बड़ी उपलब्धि रही कि इसने केंद्रीय राजनीति के एजेंडे में पर्यावरण को एक सघन मुद्दा बना दिया। चिपको आंदोलन से जुड़े और कुमाऊ यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर डॉ. शेखर पाठक बताते हैं, ‘भारत में 1980 का वन संरक्षण अधिनियम और यहां तक कि केंद्र सरकार में पर्यावरण मंत्रालय का गठन भी चिपको की वजह से ही संभव हो पाया।’
उत्तर प्रदेश (वर्तमान उत्तराखंड) में इस आंदोलन ने 1980 में तब एक बड़ी जीत हासिल की, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने प्रदेश के हिमालयी वनों में वृक्षों की कटाई पर 15 वर्षों के लिए रोक लगा दी। बाद के वर्षों में यह आंदोलन पूर्व में बिहार, पश्चिम में राजस्थान, उत्तर में हिमाचल प्रदेश, दक्षिण में कर्नाटक और मध्य भारत में विंध्य तक फैला गया था। उत्तर प्रदेश में प्रतिबंध के अलावा यह आंदोलन पश्चिमी घाट और विंध्य पर्वतमाला में वृक्षों की कटाई को रोकने में कामयाब रहा। साथ ही यह लोगों की आवश्यकताओं और पर्यावरण के प्रति अधिक सचेत प्राकृतिक संसाधन नीति के लिए दबाब बनाने में भी इसने बड़ी भूमिका निभाई।
चिपको की तर्ज पर अप्पिको
दक्षिण भारत में भी चिपको आंदोलन की तर्ज पर ‘अप्पिको’ आंदोलन उभरा, जो 1983 में कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ क्षेत्र से शुरू हुआ। वहां सलकानी तथा निकट के गांवों के जंगलों को वन विभाग के आदेश से काटा जा रहा था। तब इन गांवों की महिलाओं ने पेड़ों को गले से लगा लिया। यह आंदोलन लगातार 38 दिनों तक चला। सरकार को मजबूर हो कर पेड़ों की कटाई रुकवाने का आदेश देना पड़ा।
सेवा मंडल की महिलाएं
राजस्थान में उदयपुर के निकट ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाएं पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर ऊसर एवं रेतीली भूमि को हरे-भरे खेतों में बदल रही हैं। ‘सेवा मंडल’ एक संस्था ने पिछड़े भील समुदाय को इतना अधिक प्रेरित किया है कि अब वह सैकड़ों वर्षों से वीरान पड़ी भूमि को हरा-भरा बनाने में जुट गया है। यह संस्था उदयपुर के छह विकासखंडों की सुरक्षा में बड़े ही मनोयोग से जुड़ी है। उनके इस उत्साह एवं सफलता को देखते हुए ही पर्यावरण-संरक्षण के लिए वर्ष 1991 का ‘केपी गोयनका पुरस्कार’ इन महिलाओं द्वारा तैयार ‘सेवा मंडल’ नामक संस्था को मिला है।
देवदार की हिफाजत
हिमाचल प्रदेश की महिलाएं भी पर्यावरण-संरक्षण कार्यक्रम में किसी से पीछे नहीं हैं। यहां की महिलाएं छोटे-छोटे गुट बनाकर आंदोलन में सक्रिय भागीदारी निभा रही हैं। यही कारण है कि अखबारों में इनकी चर्चा तक नहीं है। हिमाचल प्रदेश में ही रामपुर परगने में तुरू नाम का एक गांव है। गांव की महिलाओं ने देवदार के वृक्षों को काटने से बचाकर अच्छा-खासा तहलका मचा दिया है। केशू देव नाम की एक महिला की जमीन पर देवदार के पेड़ लगाए थे। जब उसकी मौत हो गई तो उसका लड़का उन पेड़ों को काटकर उस भूमि का प्रयोग दूसरे कार्यों में करना चाहता था। किन्तु स्थानीय महिला मंडल से जुड़ी महिलाएं सक्रिय हो गईं और उन्होंने पेड़ों को काटे जाने का प्रयास विफल कर दिया।
रेत पर हरियाली
राजस्थान की बिश्नोई समाज की महिलाओं ने भी इस ऐसा ही एक अनोखा उदाहरण पेश किया है। थार रेगिस्तान के मध्य बिश्नोई जाति की बस्ती एक नखलिस्तान की तरह दिखती है। यह इस जाति की महिलाओं का पेड़ों के प्रति अनुराग का फल है। उनके समाज में एक लोक कथा प्रचलित है कि प्राचीन काल में जब राजा के नौकर एवं कर्मचारी राजमहल बनाने के लिए वृक्षों को काटने आते थे इस जाति की महिलाएं पेड़ों को काटने से बचाने की दृष्टि से पेड़ों से ही लिपट जाती थीं और कर्मचारी पेड़ों के साथ निर्दयतापूर्वक महिलाओं को भी काट देते थे। जब राजा ने यह सुना कि पेड़ों के साथ महिलाएं भी काट डाली जा रही हैं, तो राजा ने उस क्षेत्र में जंगलों को कटवाना रोक दिया।
इस तरह विश्नोई जाति की महिलाओं ने न केवल उस समय पेड़ों की सुरक्षा की, बल्कि एक इतिहास रच डाला, जो आज भी महिलाओं के लिए प्रेरणा का काम करता है और आज भी पहाड़ों पर महिलाएं यही प्रक्रिया अपना कर पेड़ों को बचाने में लगी हैं।
-शब्द प्रकाश

