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आदिवासी महिला के पानीदार काम से तर सौ गांव 

राजस्थान की प्यास इसलिए बड़ी नज़र आती है क्योंकि यहां का सबसे बड़ा इलाका थार रेगिस्तान का है। दिखने में सूखा मगर इतिहास में महेन्द्र-मूमल की प्रेम कहानी से हरा भरा। मूमल से मिलने रात के पहर हर दिन आने वाला ये राजा आज के पाकिस्तान के सिन्ध इलाके का था और मूमल मौजूदा सरहद के इस पार जैसलमेर की। यहां इस राजकुमारी की एक ही निशानी बची है – एक खण्डहर। लेकिन सुनते हैं तब इस इलाके में उपवन थे, सरोवर थे, पंछी और जन्तु थे। आज दूर दूर तक रेतीले धोरे हैं। छितरी हुई आबादी है। मगर राजस्थान के दूसरे इलाकों की तस्वीर में जीवन के कई रंग आज भी भरे पूरे हैं। जल, जंगल, जमीन के कुदरती नज़ारे हर उस जगह हैं जहां आदिवासियों की बस्ती है। ऐसा ही है राजस्थान का बारां जिले यानी हाड़ौती अंचल के शाहबाद का इलाका जहां के सीताबाड़ी में सीता ने वनवास काटा और लव-कुश को जन्म दिया। पहले राजे रजवाड़ों की अनदेखी और फिर आजाद हिन्दुस्तान में बनी नीतियों और उनकी खामियों का खामियाजा भुगतती सहरिया जनजाति का बसेरा इसी इलाके में ज्यादा है। शाहबाद की एक पंचायत या गांव को लांघते हुए आप दूसरी में दाखिल होंगे तो कुन्नू, रेती या सिरसा नदियों में से कोई न कोई आपकी पगतली को भिगोते हुए निकलेंगी। यूं जिले में तो कई और नदियां बहती हैं लेकिन आप सिर्फ उन्हें बहता हुआ देखेंगे, ठहरा हुआ कहीं नहीं। छरहरे औरत-आदमी और मचलते बच्चे नदी में छलांग लगाते, नहाते-छपछपाते नज़र आ जाएंगे लेकिन बहते पानी को बांध नहीं पाने का नतीजा यहां के एक गांव पुरमपुर की कोता बाई जैसी हजारों औरतों ने भुगता है। पानी और जीवन की बेहतर बयानी वही कर सकती हैं। 

पलायन दूर, खुशहाली पास 

दो नदियां और पथरीले रास्ते पार करके 55 साल का जीवन जी चुकी कोता बाई के घर पहुंचे तो दिन ढल चुका था। बिजली नदारद थी। सांझ का वक्त श्रमजीवियों-किसानों के चूल्हे का। दिन भर की थकान मिटाने का। और अपने पशुओं को चारा, दवा, पानी का। लाड़-प्यार का। उस वक्त एक बीमार बकरी की तीमारदारी में लगी कोता बाई कभी पूरे परिवार के साथ षहरों में मजदूरी करती। पीछे छोटे बच्चों और घर के बड़े-बुजुर्ग दोनों की देखरेख राम भरोसे। नदियों का पानी तो अपनी मौज में बहता निकल जाया करता। गर्मी के दिनों में तो किल्लत इतनी कि कंठ और खेत तरस जाते थे। न फसल, न पानी, न काम। रास्ते के साथी छीतर जी कुन्नू की सखी नदी को पार करते हुए बताते जाते हैं कि बगल का गांव पूरे ब्लॉक का सबसे सूखा क्षेत्र घोषित है, यानी डार्क ज़ोन। अंधेरे में भी कोई बात अधूरी न रह जाए इसलिए कोता बाई अपनी झुर्रियों में दर्ज एक एक वाकया तसल्ली से कहती रहीं। जब सामाजिक संस्थाओं के प्रतिनिधि पुरमपुर और आस पास के गांवों में आने जाने लगे तो जीवन की तकलीफों से निजात पाने की आस जागी। गांव की खरी मिट्टी को जानकारी की खाद जरा भी मिल जाए तो सोच और मेहनत का अंकुर तो जल्दी फूटता ही है। पलायन की पीड़ा को तो धकेलना ही था तो सामूहिक ताकत और सहकारिता की सोच की बुआई की सोच उपजी। करीब अठारह साल पहले जब अकाल की मार पड़ी तो संस्थाओं की ओर से राहत के काम गांव गांव हुए। पूरा गांव जुटा और बरसते अमृत को गांव में ही रोकने के लिए तलाई की खुदाई का बीड़ा उठाया। पसीने की बून्दों को जब बारिश की फुहारों से ही राहत मिलने लगी तो आस जागी कि यदि नदी का पानी रास्ता बदल कर गांव तक आ जाए तो पथरीली जमीन को फाड़ कर भी जुताई कर दें। गांव के बड़े बुजुर्गों और महिलाओं के साथ बैठक, छोटी छोटी बचत, गांव के विकास की चर्चा, जल-जमीन की सार संभाल और पानी लाने के लिए साझी मेहनत, सब हलचल एक साथ होने लगी। संस्थाओं का साथ था तो किसी ने मौका नहीं गंवाया और पूरा गांव 2006 में अपनी आमदनी का 20-25 फीसदी देकर साथ जुट गया और पुरमपुर गांव में दो एनीकट बनाकर दम लिया। गांव में नाड़ी बनाई, घाटी से बहकर आने वाले पानी को सहेजने के लिए नहर बनाई और कुन्नू नदी पर लिफ्ट लगाकर चार हजार फीट पाइपलाइन डालकर खेतों तक पानी पहुंच गया। मध्यप्रदेश के झाबुआ से यहां बसे भील समुदाय की कोता बाई उस वक्त  ग्राम विकास समिति की अध्यक्ष भी थीं। वो आगे आगे रहीं। इन सब कामों में हर परिवार का श्रमदान हुआ और पानी अपना रास्ता बनाकर इस कर्मठ-निश्छल गांव के पास आ गया। आज असर ये कि कभी पूरा बंजर पड़ा पथरीला गांव खेती वाला हरियाला बन गया है। अब करीब 60 परिवारों के इस गांव से कोई पलायन नहीं करता। सभी सरकारी योजनाओं का फायदा ले पा रहे हैं। बैंक अकाउंट हैं, घर की रसोई में गैस सिलेण्डर और चूल्हा है, कुछ घरों में ट्रैक्टर में है, मोटरसाइकिल है, बाजार और भाव दोनों का खूब अन्दाज़ है। और मां-बेटियां-बहुएं घरों में, खेतों में हैं तो फसलें और परिवार दोनों फल फूल रहे हैं। 

कड़ी मेहनत, खरी कमाई 

इस बार दिन के वक्त कोता बाई के यहां दोबारा दस्तक दी तो 18 बीघा में लहलहाते उनके मक्के और तिल्ली के खेत से गुजरते हुए गांव, पंचायत और आस पास के पूरे समाज के विकास की उनकी लोक-समझ की झलकी भी मिलती गई। पांवों को धंसने से बचते बचाते कोता बाई के कदमों का पीछा करते कराते टिड्डी के हमले से उजड़ी उड़द की फसल को उंगालते हुए पहुँच पाए एनिकट तक। एक बड़ा सा सांप देखते ही छूमन्तर हो गया पानी में। वहीं से दूर दूर तक मेढ़बन्दी से रोकी गई मिट्टी की कटाई और परम्परागत ज्ञान के साथ गांव वालों की अपनी समझदारी का नज़ारा भी देखा। रास्ते में तलाई में उगे पेड़ों पर चार बया पंछियों को अपने घोंसले बनाने में मगन देखकर ठिठके तो कोता बाई नन्हे पंछियों की सूझ बूझ से इन्सानी फितरत की बात कहने लगी इन पंछियों को पता है कुदरत के साथ नाता ही जीवन है लेकिन आदमियों को समझाने में कितना वक्त लगता है फिर भी समझे, न समझे कोई कह नहीं सकता। फिर भी अच्छी समझ को आजमाने का ये असर है कि गांव में अब रबी और खरीफ दोनों फसलें होती हैं। कोता बाई के खेतों में सफेद और पीली मक्का, तिल्ली, चना, उड़द, सरसों, गेहूं और घर की बाड़ी में लौकी, बैंगन, भिण्डी सब उगता है। साल भर गोदाम भरा रहता है और मौसमी सब्जियां पूरे साल उगी रहती हैं। प्रधानमत्री आवास योजना में मिले पैसे से कोता बाई के घर में तीन पक्के कमरे और चबूतरा बना हुआ है जिनमें से दो में फिलहाल गेहूं और चने की बोरियां और पारम्परिक बीज के गोदाम बने हुए हैं। इस बार मक्का और गेहूं से डेढ़ लाख पल्लू में आए और बाकी साल भर में साढ़े तीन चार लाख की कमाई हो ही जाती है। जब पलायन का इरादा छोड़कर संस्थाओं की बैठक में जाने लगी थीं तो समाज के कुछ लोग ऊंचा नीचा कहते भी लेकिन उनके पति हथसिंह जी की हमेशा आड़ रही। घर से दूर पन्द्रह बीस दिन किसी प्रशिक्षण में जाना हो, महिलाओं के समूह बनाने या गांववासियों को जागरूक करने जाना हो या फिर खेती किसानी के नए तरीके और जानने की ललक हो उन्होंने कदम कदम साथ निभाया। आज जब पति नहीं रहे तो कोता बाई उनके साथ को पल पल याद करती हैं कि एक आदमी की खुली सोच महिला को पूरे समाज को बदलने का हौसला थमा देती है। सुकून इस बात का है कि घर धन-धान से भरा हुआ है। बेटे बहुओं, पोते पोतियों से रौनक है। पांचों बेटियां अपने अपने घरों में खुश हैं। एक बेटा सहरिया आदिवासियों के बच्चों के लिए खुले स्कूल में पढ़ाता है तो दूसरा खेती-बाड़ी में हाथ बंटाता है।  

कच्चा तवा, पक्का प्रेम 

अपने श्रम से बने इन जल स्रोतों से नाता ये है कि एक बार एक एनीकट टूट गया तो कोता बाई खुद ही मरम्मत करने में जुट गई। देखा देखी पूरा गांव और मदद करने के लिए संस्थाएं साथ खड़ी हो गई। जबान की पक्की कोता बाई का आज ये सम्मान है कि उनका कहा कोई नहीं टालता समाज और आस पास भी। अगल बगल के गांवों को छूते हुए गुज़रे तो बदलाव की आहट सिर्फ पुरमपुरा गांव में ही नहीं आस पास के करीब सौ गांवों में सुनाई दी। गांव की महिलाओं की छोटी छोटी बचत और उससे लोन लेने की सुविधा को भी सरकार और स्वयं सेवी संस्थाओं ने संगठन का स्वरूप देकर गांवों का स्वाभिमान भी महसूस किया जा सकता है यहां। इस इलाके में महिला समूहों के साथ काम कर रहे सामाजिक कार्यकर्ताओं ने महिलाओं का नेटवर्क तैयार करने के लिए कोता बाई जैसी महिलाओं के नेतृत्व में सबको संगठित किया। भारत सरकार की योजना के तहत मिले फण्ड से महिला सोसायटी का काम काज खड़ा हुआ। स्वयं सहायता समूह बने। आज कोता बाई के साथ सौ गांवों की करीब पांच हजार महिलाएं जुड़ी हैं। सब मिलकर पानीदार काम कर रही हैं। शिक्षा की अलख, बेटियों को स्कूल से जोड़ना, स्वास्थ्य की जागरूकता, नशे की लत छुड़वाना और खेती के नए तौर तरीकों के साथ साथ अपनी बचत के खातों को घर-परिवार में आड़े वक्त के लिए सहेजना सब काम आदिवासी महिलाओं ने अपने हाथ ले रखा है। और आगे बढ़ने का पैमाना कमाई-कौशल ही नहीं बल्कि रिश्तों की गर्माहट है। खेत में सब काम के बारे में पूछताछ करते हुए पसीने से तर हुए तो मेहनत की लकीरों से भरी अपनी हथेली से कोता बाई ने ठहर कर, पलट कर मेरा पसीना ऐसे पोंछा कि ये पल सजल होकर दिल की तलाई में सहेजा रह गया। खेत और कोता बाई के घर के रास्ते में खुले आंगन वाले एक घर से झांकते बच्चे, एक कमरे में चूल्हे के पास शरमाती सी घर की बहू और दूसरे में चूड़ी-काजल-बिन्दी-लिपस्टिक यानी मेकअप की पूरी दुकान। और जल के लिए की कड़ी मेहनत की बदौलत दो मुंह वाले चूल्हे पर सफेद मक्के की करारी सिकी रोटी के साथ गैस सिलेण्डर पर पकी खेत से ताज़ा तोड़े कच्चे ककोड़े की बेहद स्वाद सब्जी से पावणों का स्वागत करता, कच्चे तवे और पक्के प्रेम वाला पूरा गांव।

– डॉ क्षिप्रा माथुर