कोरोना के कहर के बीच पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा जिस दवाई की बात होने लगी वो है मलेरिया से निपटने वाली हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन। लेकिन अजब संयोग है कि मलेरिया का रिश्ता एनेफलीज मच्छर से साबित करने वाले रोनॉल्ड रॉस ने अपना पूरा शोध भारत में रहकर किया था। और मलेरिया की दवाई बनाने वाला तो विदेश में पढ़ा मगर पैदाइशी भारतीय ही था। तो बात पहले एक सर्जन की। बरसों पहले यानी देश में आजादी के पहले संग्राम यानी 1857 में अंग्रेज आर्मी जनरल के यहां अल्मोड़ा में जन्मे थे रोनाल्ड। पूरा नाम था रोनाल्ड रॉस। ब्रिटेन में पढ़ाई की तो कविता, लेखन, गीत और गणित बस यही दुनिया थी उनकी। खैर फिर मेडिकल की पढ़ाई की और भारत में सर्जन की तरह फिर से 1995 में भारत लौटने पर उन्होंने में मद्रास में नौकरी पर तैनात रहते हुए इस बात की पुष्टि करनी चाही कि मलेरिया और मच्छरों का कोई रिश्ता है। लेकिन जैसा व्यवस्था में होता है कि उसे आपके मौलिक चिन्तन से नहीं कागजों के कारागार से प्यार होता है। तो बस रोनॉल्डा रॉस का तबादला कर दिया गया। तबादला किया गया ऐसी जगह जहां मच्छरों का प्रकोप था ही नहीं तो शोध क्या खाक होता।
राजपुताना में रोनाल्ड
राजपुताना यानी आज का राजस्थान। यहीं भेजा गया था उन्हें। फिर उन्होंने नौकरी छोड़ने की धमकी दी तो फिर काला अजार और मलेरिया पर काम करने के लिए उन्हें साल भर की स्पेशल ड्यूटी देकर वहीं रखा गया। सिकन्दराबाद में 20 अगस्त 1897 में ये बड़ी सफलता उनके हाथ लगी। चार दिन पहले मरेरिया के मरीज का खून पीने वाले एनाफलीज़ मच्छर के पेट से उन्हें मलेरिया का परजीवी पकड़ में आया। और फिर तो यहीं भारत में उनका शोध जारी रहा। उन्होंने ये भी प्रमाणित किया कि यही मच्छर पक्षियों में भी इस बीमारी को फैलाते हैं। 1899 में रोनाल्ड ने भारतीय मेडिकल सेवा से इस्तीफा दे दिया। ब्रिटेन लौट कर उन्होंने अपना एक संस्थान स्थापित किया और फिर दुनिया भर में मलेरिया को मिटाने की मुहिम में जुट गए। 1902 में उन्हें मलेरिया पर किए काम के लिए नोबेल पुरस्कार मिला।
हिन्दू केमिस्ट्री के रॉय
अब बात करते हैं दूसरे वैज्ञानिक की। ये थे रसायनशास़्त्री आचार्य सर प्रफुल्ल चन्द्र रॉय। विदेश से बड़ी से बड़ी डिग्री लेकर लौटे थे। इतिहासकार, उद्यमी और दानदाता भी थे वो बड़े। भारतीय रसायन विज्ञान के पिता कहे जाते थे।
सत्येन्द्रनाथ बोस की कहानी ’मीरा’ के अंक में छापी थी हमने। उनके जैसी कई बंगाली-भारतीय हस्तियों के गुरू थे सर प्रफुल्ल चन्द्र। उन्होंने भारतीय रसायन के इतिहास पर उसी साल किताब लिखी थी जिस साल रोनाल्ड रॉस को नोबेल मिला था। यानी 1902 में और किताब का नाम था – ’अ हिस्ट्री ऑफ हिन्दू केमिस्ट्री फ्राम द अरलिएस्ट टाइम्स टू द मिडिल ऑफ सिक्टीन सेण्चुरी’। वो दौर ही जन जागरण का था और हर बुद्धिजीवी अपनी अपनी तरह से भारत को सोते से जगा रहा था। ये पहला काम था जब विज्ञान के विकास को भारतीय सन्दर्भ में लिखा गया। उस वक्त के बड़े वैज्ञानिक सिर्फ वैज्ञानिक शोध ही नहीं बल्कि उद्यमिता की अहमियत भी जानते थे। प्रो रॉय ने बंगाल केमिकल्स एण्ड फर्टिलाइजर की स्थापना की। देश की पहली फार्मा कम्पनी थी ये। और यहीं की प्रयोगशाला थी जहां प्रो प्रफुल्ल चन्द्र रॉय ने आज दुनिया में सबसे चर्चित दवाई ’हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन’ का आविष्कार किया था।
रॉय का विज्ञान, दान-धर्म
और जब इस दवाई की बात कर रहे हैं तो उसे बनाने वाले वैज्ञानिक यानी प्रो प्रफुल्ल चन्द्र रॉय के चिन्तन को भी जानने का मौका है। बंगाल में बाढ़ के लिए उन्होंने उस वक्त 25 लाख का दान दिया था, साधारण ब्रह्नो समाज और बच्चियों की शिक्षा और रसायन विज्ञान की पढ़ाई के लिए वो नियमित दान देते थे जब उन्होंने कहा था कि ’मैंने कक्षा में इतना कुछ पढ़ाया। मैंने सिखाया कि पृथ्वी की छाया चन्द्रमा पर पड़ती है तब चन्द्रग्रहण होता है। विद्यार्थियों ने इसे पढ़ा, लिखा, परीक्षा में अच्छे अंक भी प्राप्त किएं। लेकिन आश्चर्य ये है कि जब वास्तव में चन्द्रमा पर ग्रहण की छाया पड़ी तो यही विद्यार्थी ज्योतिष की अवधारणा और ’चन्द्रमा को राहू ने निगल लिया’ जैसी बातें दोहराते हुए ढोल, ताशे, घण्टे, घड़ियाल और शंख बजाते हुए सड़क पर आ गए। हाय! यह आश्चर्यजनक भारतवर्ष!

